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Pardadaari (पर्दादारी) - TTS Islamic Collection™

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 ↳ पर्दादारी पोस्ट नं. ➪ 01 ↲

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✿➺ सवाल :- 1

हज़रत ये जो आजकल औरतें लड़कियां बाज़ार में, बुर्का तो पहनती हैं मगर चेहरा खुला रखती हैं क्या ये सही है ग़ैर मर्द के सामने चेहरा खोल सकते है, और अगर किसी से कहो की चेहरा ना खोलो तो कहती हैं शरीअत ने चेहरा खोलने की इजाज़त दी है, आप बताएं क्या सही है ?

❀➺ जवाब :-

 पर्दादार चेहरे को चमकाता हुआ, झूठे पर्दो पर कहर बरसाता हुआ, (रादुल हिजाब बिल बातिल निकाब) {सभी माली फैली इबादत अज़मत वाले शोहरत वाले इज़्ज़त वाले ज़मीन और आसमान के नूर (अल्लाह) के लिए, जो चमकाएगा, कियामत में चेहरा अपने करम से इस तह़रीर के लिखने वाले का, और पढ़ने वालों और ख़ास कर अमल करने वालों का, उनके साथ जिनके साथ वादा किया गया की कुछ चेहरे हश्र के मैदान में चमकते होंगे, और दुरूद ओ सलाम हो बेशुमार बेशुमार उस नूरानी चेहरे वाले के लिए जिनकी औलाद दर औलाद को इमामे अहले सुन्नत ने नूर फ़रमाया, और तमाम सहबा और अहले बैत पर जिन्होंने गवाही दी की  हुजूर ﷺ का चेहरा 14 वी के चाँद से ज़्यादा चमकदार था} जी हाँ पुर फितन दौर को देखते हुए उलमा ने चेहरे को छिपाने को वाजिब लिखा है, मैं कहता हूँ (अल्लाह ही की तोफ़िक़ से) की सारा कमाल और वबाल चेहरे का ही है, चेहरा ही भाता है, और चेहरा ही डुबाता है, और कल दोज़ख में भी कुछ औरते अपने चेहरे नोचती होगी, मगर कुछ के चेहरे तो नूरानी होंगे तो फ़िर मेरी इस बात में कुछ मुबालग़ा नहीं, अगर में कहूँ, की  

“हुस्न का दारो - मदार चेहरे पर है, जो ग़ैर मर्द से हुस्न को छुपाना है उसे चाहिए की चेहरे को छिपा ले"

📕 फतावा रज़विया जिल्द : 14 सफ़ह : 552 पर है

➪ “उलामा ने चेहरे छिपाना सदी अव्वल में वाजिब ना था, वाजिब कर दिया"

➪ हिदाया में हैं :  

यानि :

“चेहरे पर पर्दा लटकाना औरतों पर वाजिब है"

➪ शरह लिबास में है :

 यानि : 

“यह मसअला इस बात पर दलालत करता है की औरतों को बिला ज़रूरत अजनबी लोगों पर अपना चेहरा खोलना मना है"

➪ दुरै मुख़्तार में है :

  यानि :

“फ़ित्ने के ख़ोफ़ से औरत को मर्दो में चेहरा खोलने से रोका जाये"

“इस क़िस्म के सेकड़ो मसाइल हैं जिसे उलामा ने वक़्त की नज़ाकत के तहत बदल दिया"

 और जो कहै की ये हुजूर ﷺ के वक़्त में नहीं था या शरीअत में पहले नहीं था अब क्यूँ तो वो जाहिल है क्यूंकि इस तरह के हुक़्म शरीअत के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि ऐन शरीअत ही के मुताबिक़ और हुज़ूर ﷺ के फ़रमान ही के मुताबिक़ हैं, और अगर कोई अहमक औरत जो अहकामे शरीअत से बेख़बर हो और यूँ कहै की जब दौरे रसूल में चेहरा छिपाना वाजिब नहीं तो अब क्यूँ तो इसका जवाब ये है की दौरे रसूल में तो औरते मस्जिद में भी नमाज़ पढ़ती थी

➪ बल्कि हुजूर ﷺ ने फ़रमाया :

“जब तुम में से किसी की औरत मस्जिद जाने की इजाज़त चाहै तो उसे मना ना करो"

  (इस हदीस को बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया) 

➪ और फ़रमाया हदीस में :

“अल्लाह की कनीज़ों को अल्लाह की मस्जिदों से ना रोको" 

(मुस्लिम और अबु दावूद ने सुनन में नक़ल किया)

➪ मगर आज कोई औरत नहीं कहती की मस्जिद में जमाअत से नमाज़ पढना चाहती हूँ, क्यूंकि वो तो पहले ही घर में भी नमाज़ पढना नहीं चाहती और नमाज़ में कसरत है वुज़ू और हाथ पैर हिलाने की और चेहरा दिखाने में हुस्न का दिखावा ज़ीनत का इज़हार है कोई कसरत मशक्क़त नहीं बल्कि दिल को भाता है, की ग़ैर हमारा हुस्न देखें, तो ख़ुद ग़ौर कर ले की नफ़्स की ग़लबे की ख़ातिर चेहरा खोलना चाहती है या शरीअत की ख़ातिर इसलिए तरह - तरह के हीले करती है और नफ़्स पर फ़ौरन शरीअत और रसूल का दौर याद आ जाता है, जमाअत से नमाज़ पर कभी ना आया, पहली सदी में औरतें मस्जिद जाती मगर बाद में वक़्त की नज़ाक़त के तहत दौरे फ़ारूके आज़म में इसे भी बंद करना पढ़ा, उस वक़्त क्या हज़रत उमर और हज़रत आयशा को ये नहीं मालूम था की वो ऐसे काम पर पाबन्दी लगा रहे हैं जिस पर हबीबे ख़ुदा ﷺ ने पाबन्दी ना लगाईं, बल्कि

➪ हज़रत आयशा रदिअल्लाह तआला अन्हा ने फ़रमाया : 

“हुज़ूर ﷺ हमारे ज़माने की औरतों को देखते तो उन्हें मस्जिद जाने से मना करते जैसे बनी इसराइल ने अपनी औरतों को मना कर दिया"

➪ “इस फ़रमान से ये साबित है हुज़ूर ﷺ भी होते तो उस दौर को देखते हुए ज़रूर यही हुक़्म देते जो हमने दिया"

इस हदीस से चमकते चेहरे की तरह साफ़ हो गया की उलामा का कोई फ़रमान खिलाफे रसूल नहीं होता बल्कि एन हुक़्मे रसूल पर होता है, उसके बाद आज तक उलामा ने औरतो को मस्जिद की हाज़री से बाज़ रखा क्यूंकि अब तो दौर उससे भी ज़्यादा आग बरसाने वाला है,

➪ फ़तहुल क़दीर में है:

 यानि : 

“फसाद के ग़लबे की वजह से तम वक्तों की नमाज़ों में जवान बूढी औरतों का निकलना मुताखिरीन ने माना फ़रमाया है"

➪  फ़िक्ह का एक क़ायदा भी है की :

 “ज़माने की तब्दीली के सबब एह़काम की तब्दीली का इंकार नहीं किया जा सकता"

➪ खुलासा ए कलाम और मेरी राय भी यही है की, हर मर्द पर लाज़िम है की वो ग़ैर के सामने पर्दे के साथ साथ अपनी औरत को चेहरा छिपाने का भी हुक़्म दे, और जो ये कुछ निक़ाब होते है जिसमे आँखे खुली होती है,

“मेरे नज़दीक इसका पहनना भी नापसंदीदा है, (और ये मेरी जाती राय है) (बल्कि आँखो सहित पूरा चेहरा ढका होना चाहिए"

इसकी एक ख़ास वजेह है की चेहरा छिपाने का हुक़्म इसीलिए है की

“ना रंग दिखे ना उमर"

मगर निकाब मे आखे खुलें रहने से औरत की उमर और रंग का अंदाज़ा हो जाता है और ये भी की जवान है या बूढ़ी 

“बस ये दिल मे फ़साद पैदा करने के लिए काफ़ी है"

तो चाहिए मुसलमान इज़्ज़त वाले मर्दो और औरतो को की बाज़ारो और ग़ैर मर्द के सामने मुक़म्मल पर्दा करे यानी चेहरा भी छिपाए और आँखे भी ढक कर रखे, और घर मे रहते हुए घूंघट करा जा सकता है इसमे दुशवारी नहीं है, अगर कोई करना चाहे,

➪ और मुझे हैरत है दौरे रसूल मे तो सहाबिया रात - रात भर नमाज़ पढ़ती थी, रोज़ा रखती थी, इस काम को लेकर वो दौर याद क्यूँ नही आता की हम भी रातो को आराम ना करके नमज़े पढ़े ?, दौर याद आया तो चेहरे के खोलने पर ?

➪ इस कलाम को पढ़ने के बाद कहेंगे कुछ बेबाक़ लोग की 

“पर्दा आँखो का है"

फिर मैं कहूँगा की अगर इस दौर मे लोगो मे हया ज़्यादा आ गई क्या उस पहली सदी मे हयादार नही थे और मुमकिन है फिर कोई बेबक़ बोल बेठे की

“दिल साफ़ होना चाहिए"

➪ तो मेरा जवाब यही होगा की जब हज़रत आयशा रदिअल्लाह तआला अन्हा हुज़ूर ﷺ के मज़ार पर हाज़िर होती तो

(पर्दे का ख़ास ख़्याल ना रखती) फ़रमाती ये मेरे शोहर है, फिर जब हज़रत अबु बक़र हुज़ूर के क़दमो मे दफ़न हुए तो भी यही हाल था क्यूंकी अब एक शोहर एक वालिद थे मगर जब हज़रत उमर का मज़ार भी वही बना तो ख़ूब ढक कर आने लगीं, क्यूंकी हज़रत उमर ग़ैर मर्द थे, फिर वही बात,

➪ क्या हज़रत उमर से ज़ियादा इज़्ज़त वाले इस ज़माने मे आ गये या हज़रत आयशा से ज़्यादा हया वाली आ गई, जो तुम्हारे सिर्फ़ दिल का पर्दा काफ़ी है, कही इसका मतलब ये तो नही है, की आप साबित करना चाहते हो की आप उन हज़रात से ज़्यादा नेक हो ???

➪ अल्लाह ता'आला से दुआ है की वो इस कलाम मे छिपे असली मक़सद मे कामयाबी दे, और मुसलमान औरतों को इसे समझने और दिल से क़ुबूल करने और अमल करने का जज़्बा दे, ताकि कल चेहरा ख़ुदा के सामने दिखाया जा सके, और घर मे देवर, जेठ कज़िन से भी घूंघट करने की तोफिक़ बख़्शे, और अगर कोई ऐसा करे तो बेशक ज़्यादा सवाब की हक़दार होगी

➪ तुम्हारा रब फ़रमाता है क़ुरआन सुराहः 99 आयत : 7 मे

➪ “तो जो एक ज़र्रा भर भलाई करे उसे देखेगा"

➪ और फ़रमाता है सुराहः 94 आयात : 5-6 मे

➪ “तो बेशक दुशवारी के साथ आसानी है , बेशक दुशवारी के साथ आसानी है"

📕 (पर्दादारी, पेज नं. 9,10,11,12,13)

📬 पोस्ट जारी रहेगी इन शा अल्लाह...✍🏻

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टी टी एस इस्लामिक कलैक्शन™

────────────────────────────⎆​☝हमारी दावत एक सच्चे दीन की तरफ़

────────────────────────────⎆​     ✏ आओ इल्म़ -ए-दीन सीखें...✍🏻────────────────────────────⎆​⚘🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें...✍︎

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